क्या उच्च स्तरीय न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया अस्पष्ट है, क्या इसे और पारदर्शी बनाने की जरूरत है?

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पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय में खलबली का माहौल था। इसकी वजह यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को महसूस हुआ कि भारत के मुख्य न्यायाधीश अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल कर ‘राजनीतिक रूप से संवेदनशील’ मामलों को ऐसे न्यायाधीशों के सुपुर्द कर रहे हैं जिनसे सरकार के पक्ष में निर्णय किए जाने की अपेक्षा है।

इन न्यायाधीशों की हताशा इतनी गहरी थी कि उन्होंने कुछ नाटकीय सा काम कर दिया। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर सार्वजनिक रूप से अपना गुबार निकाला और कहा कि उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश से बात कर अंदरुनी रूप से इस मामले को सुलझाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने प्रकटतया इस मसले को अधिक वक्त या अहमियत नहीं दी।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ‘बिरादरीवादी’ होने के लिए बदनाम है। मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के एक ‘कोलेजियम’ ने उच्च न्यायालयों के लिए इन नए न्यायाधीशों की अनुशंसा की। इसकी प्रक्रिया अस्पष्ट है। राष्ट्रपति को निश्चित रूप से औपचारिक तरीके से नियुक्ति को मंजूरी देनी चाहिए। यह सरकार को किसी नियुक्ति को रोकने का अवसर उपलब्ध कराता है। लेकिन यह खुद से किसी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं कर सकता। यह प्रणाली दो दशक पुरानी है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 में निर्णय दिया था कि किसी न्यायाधीश को नियुक्त करने का सहज अधिकार-इसके प्रमुख अधिदेश-संविधान की मूलभूत संरचना की सुरक्षा करने की इसकी क्षमता का अंदरुनी हिस्सा है।

पूर्ववर्ती यूपीए सरकार तथा उसके बाद सत्ता में आने वाली मोदी सरकार ने ‘कॉलेजियम’ की जगह एक न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने की कोशिश की, जो भारत के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश, भारत के कानून मंत्री तथा एक समिति, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हों, द्वारा मनोनीत दो व्यक्तियों से निर्मित हो। इस अधिनियम को संसद के दोनों सदनों एवं राज्य विधान मंडलों के बहुमत द्वारा अनुमोदित किया गया जैसा कि किसी संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक है और जो राष्ट्रीय न्यायिक आयोग अधिनियम 2014 के रूप में अधिसूचित है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने 16 अक्तूबर, 2015 को संविधान के इस संशोधन को खारिज कर दिया और इसके द्वारा ‘कॉलेजियम नियुक्ति’ प्रणाली बहाल कर दी।

न्यायमूर्ति जे एस केहर, जो इस अधिनियम को खारिज करने वाली पीठ के अध्यक्ष थे, बाद में मोदी सरकार के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश बन गए और पर्यवेक्षकों ने कानून के शासन, संवैधानिकता की जीत तथा लोकतंत्र में शक्तियों के विभाजन के मौलिक सिद्धांत के संरक्षण का स्वागत किया। मोदी सरकार ने इस पीड़ा को खामोशी से सह लिया लेकिन इसकी क्षतिपूर्ति भी जल्द ही हो गई।

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस केहर सितंबर 2017 में सेवानिवृत्त हो गए और कोलेजियम प्रणाली के तहत पूर्व निर्णय के अनुरुप सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश दीपक मिश्रा को 28 अगस्त, 2017 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई गई। पिछले दिनों न्यायिक नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली के पूर्व समर्थक एक बार फिर सक्रिय थे और इस बार उन्होंने चार न्यायाधीशों की सराहना की जिन्होंने लोकतंत्र को बचा लिया था और उसी कॉलेजियम प्रणाली द्वारा चुने गए भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ खुले आम सामने आने के लिए उनके साहस एवं दृढ़ता के लिए उनकी तारीफ की।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसलिए, बहस करने के लिए मान लीजिए कि भारत के मुख्य न्यायाधीश वैसे न्यायाधीशों को ‘संवेदनशील’ मामले भेज रहे थे जिनके बारे में उन्होंने महसूस किया कि वे उन पर एक विशेष तरीके से निर्णय करेंगे। इन चार न्यायाधीशों के पास और क्या संभावित विकल्प उपलब्ध थे?

निश्चित रूप से पहला विकल्प था, भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ बातचीत करना एवं उन्हें इसके बारे में बताना कि वह जो कर रहे हैं, उसके बारे में उनका विचार क्या है? न्यायाधीशों का कहना है कि उन्होंने निश्चित रूप से ऐसा किया। लेकिन जब इसमें कोई बदलाव नहीं दिखा तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से आरोपों के साथ इसे उजागर करने का फैसला किया।

यह पूछा जाना मुनासिब है कि उन्होंने इस मसले पर अपने साथी न्यायाधीशों को एकजुट करने की कोशिश क्यों नहीं की? वे अन्य ‘अप्रतिबद्ध’ 18 न्यायाधीशों को यह विश्वास क्यों नहीं दिला सके कि इस बारे में कुछ किए जाने की जरुरत है? निश्चित रूप से, अगर इन चार न्यायाधीशों ने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में 10 अतिरिक्त न्यायाधीशों को विश्वास दिलाया होता और भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपना नजरिया रखा होता तो इसके नतीजे कुछ और होते।

जिन चार न्यायाधीशों ने सार्वजनिक रूप से अपनी बातें रखीं, उनमें एक न्यायमूर्ति रंजन गोगोई हैं जिनका अक्तूबर 2018 में भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भारत का मुख्य न्यायाधीश बन जाना तय है। उन्होंने इसके लिए चार और न्यायाधीशों को अपने साथ लेने का प्रयास क्यों नहीं किया जो 2024 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं और इस प्रयोजन में उनका साथ दे सकते थे? शरद अरविंद बोब्डे-का नवंबर 2019 में भारत का मुख्य न्यायाधीश बनना निर्धारित है; एन वी रमन्ना-का अप्रैल 2021 में; उदय उमेश ललित-का अगस्त 2022 में ; एवं डी. वाई चंद्रचूड़-का नवंबर 2022 में भारत का मुख्य न्यायाधीश बनना निर्धारित है। क्या इसकी वजह से इन न्यायाधीशों को इस प्रकार का उत्पीड़न महसूस नहीं हुआ? अगर मामला यही है तो इससे इन चार न्यायाधीशों द्वारा लगाए गए आरोपों का दंश काफी हद तम खत्म हो जाता है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने निश्चित रूप से सर्वोच्च न्यायालय के बाह्य कोमल आवरण को झकझोर कर ऐसा कुछ कर दिया है जिससे लोगों की धारणा उनके बारे में बदल गई है। उन्होंने सरकार को भी निश्चित रूप से चिढ़ा दिया है। पाठकों को याद होगा कि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस केहर ने भी पांच न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता करके सरकार को चिढ़ा दिया था जिसने एनजेएसी अधिनियम को अपूरणीय क्षति पहुंचाई थी। तब भी, वह भारत के मुख्य न्यायाधीश बन गए। न्यायपालिका एवं न्यायालय ने दृष्टिकोणों को इस प्रकार एकरूपित कर दिया है जिसे केवल अंदर के व्यक्ति ही इसे भेद सकते हैं।

ऐसा लगता नहीं कि न्यायमूर्ति गोगोई ने बिना अपने न्यायाधीश बंधुओं एवं न्यायालय का परामर्श और उनका समर्थन हासिल किए सार्वजनिक बयान दिया होगा। आखिर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी मानव ही होते हैं और उन्हें भी आत्म-संरक्षण करने का अवसर मिलना चाहिए। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनसे तर्कसंगत होने, अपनी भावना का परित्याग करने एवं उनके दिमाग के उनके दिलों पर हावी रहने की उम्मीद की जाती है।

क्या इसका अर्थ यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासन के साथ न्यायाधीश बिरादरी के भीतर गहरा असंतोष पल रहा है? और क्या इससे यह प्रदर्शित नहीं होता कि बदलते समय के साथ न्यायपालिका में भी बदलाव की जरुरत है?

बजाए इसे भारत के मुख्य न्यायाधीश के विशेषाधिकार पर छोड़ने के, आवंटन की प्रक्रिया को थोड़ा और स्पष्ट करना, एक अच्छी शुरुआत होगी। एक विशेष निर्धारित सरल गणीतीय नियम का उपयोग कर मामलों को बेतरतीब तरीके से आवंटित किया जा सकता है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों का दर्जा समान होता है और वे कई वर्षों के अनुभव के बाद इस न्यायालय में आते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर ‘कॉलेजियम’ प्रणाली न्यायाधीशों का उनके अनुभव के अनुरूप चयन करने में विश्वसनीय और आसान नहीं है तो फिर आखिर एनजेएसी के सहयोगात्मक दृष्टिकोण का प्रयास क्यों न किया जाए। आखिरकार, चार में से एक न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एन. चेलमेश्वर ने एनजेएसी का समर्थन करते हुए असहमतिपूर्ण निर्णय के बारे में लिखा था। सरकार के किसी सहायक संस्थान का नैतिक गुण पर एकाधिकार नहीं हो सकता।


यह टिप्पणी मूल रूप से द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुई थी।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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