21वीं सदी में बेहतर विकास और कनेक्टिविटी के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र किस्मत वाला भूगोल है। बहुत ज्यादा संभावनाओं वाले इस क्षेत्र में प्राइवेट कैपिटल बहती है और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी लगभग 25 ट्रिलियन डॉलर का फंड प्रदान करती है।

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भारत और चीन आज उस मुक़ाम पर खड़े हैं जहाँ कुछ दशक पहले अमरीका और युरोप के कुछ देश हुआ करते थे। इस नयी बदली विश्व व्यवस्था में भारत की ज़िम्मेदारियाँ और दायित्व बढ़ता जा रहा है। भारत का ग्लोबल प्रोफाइल बढ़ रहा है। ऐसे में भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी के लिए बड़ी जिम्मेदारी भी उठानी होगी। इसके लिए भारत को अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा की क्षमता बढ़ानी होगी। भारत सरकार ने स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। यह ग्लोबल डिफेंस प्रॉडक्शन हब बनने के लिए कोशिश करने के साथ देश में नौकरियां पैदा करने और बाकी दुनिया पर रणनीतिक निर्भरता घटाने के लिए भी पहल की है। इस रणनीति को कामयाब बनाने के लिए भारत को डिफेंस इनोवेशन को बढ़ावा देने के साथ ग्लोबल भागीदारी भी बनानी होगी। क्यूँकि चीन की प्रगत्ति हर क्षेत्र में लगातार होती जा रही है। चीन ने जैसे पश्चिमी बाज़ारों में अपनी पैठ बनायी है वैसे युरपीयन देश अपनी पैठ चीनी बाज़ार में नहीं बना पाए हैं। चीन ने उत्पादन क्षेत्र में महारत हासिल कर पिछले कुछ सालों में विश्व के कई हिस्सों में अपनी मौजूदगी को मज़बूत किया है जो उसे सामरिक दृष्टि से भी शक्ति प्रदान कर रहा है।


भारत सरकार ने स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। यह ग्लोबल डिफेंस प्रॉडक्शन हब बनने के लिए कोशिश करने के साथ देश में नौकरियां पैदा करने और बाकी दुनिया पर रणनीतिक निर्भरता घटाने के लिए भी पहल की है।


चीन के अलावा विशाल इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चार बड़े लोकतंत्र देशों का समागम हो रहा है। अमरीका, ऑस्ट्रेल्या, जापान और भारत इस क्षेत्र को नेतृत्व और शक्ति प्रदान कर रहे हैं। इन चारों देशों का बनाया Quadrilateral Security Dialogue सुनिस्चित करेगा की दक्षिण चीन सागर और भारतीय महासागर पूरी तरह से शांत रहे और सभी ऐशियाई और असीयान देश इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से फ़ायदा उठा सकें। 21वीं सदी में बेहतर विकास और कनेक्टिविटी के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र किस्मत वाला भूगोल है। बहुत ज्यादा संभावनाओं वाले इस क्षेत्र में प्राइवेट कैपिटल बहती है और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी लगभग 25 ट्रिलियन डॉलर का फंड प्रदान करती है। ऐसे में अगले पूरे दशक में क्षेत्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी की कमी हो सकती है। ऐसे युग में जब कॉम्पिटिशन बहुत ज्यादा है और कैपिटल के सोर्स देशों के अंदर ही बंध गए हैं, इस क्षेत्र को फिर से सोचना होगा कि क्षेत्र को पूंजी के बहाव से जोड़ते हुए कैसे प्राइवेट इंडस्ट्री और प्राइवेट पूंजी का फायदा मिले।


अमरीका, ऑस्ट्रेल्या, जापान और भारत इस क्षेत्र को नेतृत्व और शक्ति प्रदान कर रहे हैं। इन चारों देशों का बनाया Quadrilateral Security Dialogue सुनिस्चित करेगा की दक्षिण चीन सागर और भारतीय महासागर पूरी तरह से शांत रहे और सभी ऐशियाई और असीयान देश इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से फ़ायदा उठा सकें।


अमरीका फ़र्स्ट की पॉलिसी वाली ट्रम्प सरकार अब अमरीकी इंट्रेस्ट्स को सर्वोपरि मान कर पूँजी की भागीदारी अपने देश के बाहर कम कर रही है। इंटर्नैशनल मोनेटेरी फ़ंड और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं को भी इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है जो अब तक नहीं हो रहा है। ऐसी ही स्थिति से निपटने के लिए चीन ने ऐसीयन इन्फ़्रस्ट्रक्चर बैंक खड़ा कर लिया है। चीन समय की नज़ाकत समझ कर अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करते हुए तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। उधर सेंट्रल युरोप में भी भारी बदलाव आ रहे हैं। पोलंड और हंगरी में दक्षिणपंथी सरकारें आने से वर्ल्ड ऑर्डर बदल रहा है। उदारवादी लोकतांत्रिक शक्तियाँ कमज़ोर पड़ती दिखायी दे रही हैं। ब्रेकक्षिट यानी यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने से एक बड़े बाज़ार में संकट खड़ा हो गया है। यूरोपियन यूनियन अभी भी 2008 की आर्थिक मंदी के नुकसान से जूझ रही है। इस मंदी ने उस आर्थिक आधार को बुरी तरह से हिला दिया था, जिसपर यूनियन टिकी है। आईएसआईएस के आने के बाद यूरोपियन सोसायटी की कमियाँ सबके सामने आ गई हैं। फ्रांस और बेल्जियम में आंतकी हमलों की वजह से यूरोपियन मूल्यों के बारे चर्चा जटिल हुई है। प्रमुख यूरोपियन देशों में राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी सरकारों की लोकप्रियता ने भी सिर्फ अनिश्चितता को ही बढ़ाया है।

इस सब स्थितियों का चीन फायदा उठा रहा है। लेकिन यह भी तय है की भारत सिर्फ़ मूक दर्शक बना नहीं रह सकता। जैसा की संसद सदस्य शशि थरूर ने कहा की अंतर्रष्ट्रिया सम्बन्धों में या तो आप टेबल पर बैठते है या आप मेन्यू का हिस्सा होते हैं। यानी ज़रूरत है अपने आप को आर्थिक तौर पर मज़बूत होने की। ताकत के सदियों पुराने आयाम अब शिफ्ट हो रहे हैं। ग्लोबल गवर्नेंस स्ट्रक्चर को स्थापित करने में हल्की से भूमिका निभा पाने वाले विकासशील देश अब हाई टेबल पर जगह हासिल कर चुके हैं। ब्रिक्स और जी20 जैसे नए संस्थानों में इन युवा आर्थिक पावर हाउसों को बोलने की ताकत मिल चुकी है। वर्ल्ड ऑर्डर में इन नए देशों और संस्थानों की भूमिका अब बढ़ती ही जाएगी और यह नयी सच्चायी पुरानी ताक़तों को माननी ही पड़ेगी।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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