भीषण मानवीय संकट से जूझ रहे रोहिंग्या शरणार्थियों ने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

म्यांमार के रखाइन क्षेत्र में कुछ पुलिस और सैन्य चौकियों पर रोहिंग्या मुसलमानों के हमलों के जवाब में सुरक्षा बलों द्वारा हाल में की गई कार्रवाई के कारण बड़े पैमाने पर रोहिंग्या आबादी को पड़ोसी देशों की ओर कूच करना पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप भीषण मानवीय संकट से जूझ रहे रोहिंग्या शरणार्थियों ने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 2012 की सांप्रदायिक हिंसा के बाद से, भारत में बड़ी तादाद में रोहिंग्या लोग दाखिल हुए हैं। वे बांग्लादेश के रास्ते भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में दाखिल होते हैं। बांग्लादेश के बाद, रोहिंग्या मुसलमानों की सबसे ज्यादा आबादी भारत में रह रही है और मौजूदा संकट के कारण शरण के लिए भारत का रुख करने वाले रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन घटनाओं के मद्देनजर, भारत के लिए बेहद आवश्यक है कि वह शरणार्थियों के संबंध में ऐसी घरेलू नीति तैयार करे, जो धर्म, रंग और जातीयता की दृष्टि से तटस्थ हो, जो इस तरह की स्थितियों को सुलझाने के लिए कारगर व्यवस्था उपलब्ध करा सके।

म्यांमार मूल के होने का दावा करने वाले रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सीमा से सटे म्यांमार के उत्तरी अराकान/रखाइन राज्य में रहते हैं। बहुसंख्यक बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच गहरे वैमनस्य, आपसी अविश्वास और जातीय संघर्ष का लम्बा इतिहास रहा है। 1982 में बर्मा के राष्ट्रीय कानून ने रोहिंग्या को “बंगाली मुसलमान” के रूप में वर्गीकृत करते हुए उन्हें नागरिकता प्रदान करने से इंकार कर दिया था। म्यांमार में प्रजातंत्र की स्थापना भी रोहिंग्या की समस्या का समाधान करने में विफल रही। यह जातीय टकराव और भी विकट हो चुका है, क्योंकि यह क्षेत्र में सशस्त्र संघर्ष में तब्दील हो चुका है।

रखाइन क्षेत्र का बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय अल्पसंख्यक मुसलमानों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, जिसके कारण रोहिंग्या लोगों को बंदी शिविरों यानी कान्सन्ट्रेशन कैम्प में कैद रखा जाता है और उनकी आवाजाही, विवाह, शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने तथा स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार से उन्हें वंचित रखने जैसे दमनकारी उपाय किये जाते हैं। इस तरह हाशिये पर डाले जाने के कारण रोहिंग्या लोगों के भीतर अन्याय का शिकार होने की भावना उत्पन्न होती है और आतंकवाद जन्म लेता है तथा वे उसे हासिल करने के प्रयास में हिंसक जवाबी कार्रवाई करते हैं, जिस पर अपना अधिकार मानते हैं। रोहिंग्या आतंकी गुट-अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी द्वारा हाल में म्यांमार के सुरक्षा बलों के विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई, दरअसल एक तरह की जवाबी कार्रवाई थी और इसके जवाब में म्यांमार के सुरक्षा बलों की ओर से रोहिंग्या आबादी पर की गई दमनकारी कार्रवाई की वजह से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता उत्पन्न हो गई है। यह मानवीय मसला है, जिसके सुरक्षा और धार्मिक पहलु भी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने क्षेत्र में हिंसा की निंदा की है और रोहिंग्या आबादी के साथ की जा रही भीषण नृंशसता को समाप्त कराने के लिए मानवीय हस्तक्षेप का आह्वान किया है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनसीएचआर) द्वारा शरणार्थी के रूप में पंजीकृत रोहिंग्या राष्ट्र विहीन और सतायी हुई आबादी है, जो अपनी मातृभूमि में अपने साथ हो रहे भेदभाव, हिंसा और रक्तपात से भागने का प्रयास कर रही है। इसलिए क्षेत्र में भारत जैसी उभरती ताकतों का दायित्व है कि वे न केवल मानवीय आधार पर, बल्कि क्षेत्र के स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण सामरिक उपाय के तौर पर भी इस मामले को देखे।

अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रोहिंग्या के मानवीय मामले को उठाने से भूराजनीतिक और सुरक्षा पृष्ठभूमि सामने आ गई, जो इस मामले पर भारत की गतिशीलता को बाधित करती है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति के अंतर्गत म्यांमार एक प्रमुख देश है और क्षेत्र में चीन के व्यापक प्रभाव का खतरा रोहिंग्या संकट के प्रति भारत की ठंडी प्रतिक्रिया का कारण है। यह तथ्य भी सर्वविदित है कि चीन, भारत को घेरने की नीति का अनुसरण कर रहा है, म्यांमार भी उसका अंग है और भारत क्षेत्र में राजनीतिक-आर्थिक प्रतिस्पर्धा में चीन के खिलाफ डटा हुआ है। रोहिंग्या से निपटने के तरीके के संबंध में म्यांमार की आलोचना का पूर्वोत्तर में सीमा प्रबंधन के प्रयासों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

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बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में बालुखली अस्थायी शरणार्थी शिविर के निकट स्थानीय संगठनों द्वारा भोजन वितरित किए जाने का इंतजार करते रोहिंग्या शरणार्थी

दूसरी ओर, भारत में बसे रोहिंग्या को देश से निकालने संबंधी गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजु के वक्तव्य की भी बहुत आलोचना हुई है। उनका वक्तव्य मानवीय आधार पर भले ही आपत्तिजनक है, लेकिन उसके निहितार्थ विदेशी आबादी के प्रवेश के कारण स्थानीय लोगों के मन में उपजने वाली सुरक्षा की आशंका की ओर इशारा करते हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों के आने से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में जातीय-धार्मिक संतुलन को खतरा है। प्रासांगिक रूप से किरेन रिजिजु पूर्वोत्तर से संबद्ध हैं और इस मामले पर बोलने वाले वह इकलौते मंत्री हैं। भारत को आतंकवादियों, अपराधियों और अवांछित तत्वों की घुसपैठ की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, जो राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। म्यांमार के बौद्ध बहुसंख्यकों के विरूद्ध गहरा वैमनस्य रखने वाली यह राज्यविहीन आबादी भारत में बौद्ध स्थलों और आबादी के लिए खतरा बन सकती है और धार्मिक आधार पर कट्टरवाद के लिए आसान लक्षित समूह हो सकती है।

यूएनएचसीआर के अनुसार, भारत में (जुलाई 2017) तक,लगभग 16000 पंजीकृत रोहिंग्या हैं, जबकि अनाधिकारिक अनुमानों में इनकी संख्या लगभग 40,000 बताई गई है।

भारत ने यूएनएचसीआर संधि (1951) या प्रोटोकॉल (1967) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन शरणार्थियों की समस्या को लेकर वह हमेशा से संवेदनशील रहा है और उसने तिब्बतियों, अफगानिस्तान के मुसलमानों, पाकिस्तान के ईसाइयों और हिंदुओं जैसे विभिन्न जातीय समूहों को कुशलतापूर्वक साथ जोड़ा है। शरणार्थियों के प्रति पारस्परिक दृष्टिकोण से प्रेरणा लेते हुए तथा प्रवासन के सुरक्षा संबंधी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, रोहिंग्या के प्रवासन के मामले का इस्तेमाल  आंतरिक सुरक्षा और मानवीय दायित्व के बीच संतुलम कायम करने वाली घरेलू शरणार्थी नीति तैयार करने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है।

जिस देश में शरणार्थियों को हानि पहुंचने की आशंका हो, उन्हें वहां जबरन नहीं भेजे जाने संबंधी सिद्धांत का पालन करते हुए निम्नलिखित कदम उठा सकता है:

i. रोहिंग्या शरणार्थियों की आबादी की जनगणना कराना साथ ही देश में उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आकलन करना। इस कदम से इस समस्या के आकार की रूपरेखा पता चल सकेगी।

ii. इस स्थिति के साथ जुड़ी सुरक्षा चिंताओं से निपटने से सीमा सुरक्षा में सुधार लाना तथा अवैध प्रवासन को नियंत्रित करना। इसमें म्यांमार सरकार और सेना का सहयोग अत्यावश्यक होगा।

iii. इस समस्या का मूल कारण म्यांमार के रखाइन क्षेत्र में है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, रखाइन म्यांमार का सबसे कम विकसित राज्य है, जहां गरीबी दर 78 प्रतिशत है, जबकि गरीबी दर का राष्ट्रीय औसत 37.5 प्रतिशत है। रखाइन में व्यापक गरीबी, खराब बुनियादी सुविधाएं और रोजगार के अवसरों के अभाव के कारण बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच दरार और चौड़ी हो गई है। इसलिए, इस संकट को सही मायने में रोकने के लिए इस क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार किए जाने की आवश्यकता है। म्यांमार सरकार की साझेदारी से यहां की सामाजिक-आर्थिक विकास परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने संबंधी भारत की पहल इस दिशा में स्वागतयोग्य कदम है।

iv. रखाइन क्षेत्र में स्थिति में सुधार होने पर भारत, शरणार्थियों को स्वदेश भेजने के लिए अस्थायी योजना बनाने पर भी काम कर सकता है। क्षेत्रीय अंतर-सरकारी संगठनों के यूरोपीय मॉडल का अनुसरण करते हुए सार्क और बिम्सटेक जैसे संगठन मिलकर विभिन्न देशों के बीच शरणार्थियों को बांटने संबंधी नीति तैयार कर सकते हैं।

रोहिंग्या संकट को मानवीय चिंता या आतंकवादी गतिविधि के परिणाम के रूप में सूचीबद्ध करने से लाखों लोगों के विस्थापित होने की सच्चाई नहीं बदलेगी। आज जरूरत इस बात की है कि ऐसी पुख्ता शरणार्थी नीति तैयार की जाए, जो न केवल वर्तमान संकट में कमी लाए, बल्कि भारत को भविष्य में होने वाली इसी प्रकार की समस्याओं से निपटने के लिए एक खाका भी प्रदान करे।


लेखक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक रिसर्च इंटर्न है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

Source:http://www.orfonline.org

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