क्या विशाल प्रवासी भारतीय समुदाय ने भारतीय हितों का विदेशों में ध्यान रखा है? वे हमारी विदेश नीति में क्या भूमिका निभाते हैं?

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण को मीडिया में काफी तवज्जो मिली है। बात सिर्फ तवज्जो की नहीं है, ध्यान देने वाली बात यह है कि राहुल गांधी का अमेरिका दौरा कांग्रेस की उस नई और व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसमें भारतीय-अमेरिकियों के महत्व को समझा गया है। शायद कांग्रेस भी अब नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति का अनुसरण कर रही है, जिसमें प्रवासी भारतियों पर काफी ध्यान दिया गया है। इसमें प्रवासियों को भारत में बदलाव लाने का प्रमुख जरिया और देश की विकास गाथा का हिस्सा माना गया है। इंडियन डायस्पोरा इनवेस्टमेंट इनिशिएटिव के लांच के मौके पर भाजपा के महासचिव राम माधव ने इस नीति को स्पष्ट करते हुए कहा था, “वे (प्रवासी भारतीय) अपने देश के समर्पित नागरिक रहते हुए भी भारत की आवाज बन सकते हैं। प्रवासी कूटनीति के पीछे दीर्घकालिक लक्ष्य यही है। यह उसी तरह हो सकता है जैसा कि ज्यू समुदाय अमेरिका में इजराएल के हितों का ध्यान रखता है।”

प्रवासी वास्तव में हैं कौन? अंग्रेजी में ‘डायस्पोरा’ शब्द के मायने काफी बदलते रहे हैं। पहले यह यूनान को उपनिवेश बनाए जाने और लोगों के पलायन के लिए उपयोग किया जाता था। बाद में इसका उपयोग ज्यू समुदाय के लोगों के लिए होने लगा जिन्हें विभिन्न देशों से बाहर निकाल दिया गया और जो अपने साथ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तत्व ले कर आए। आज प्रवासी शब्द आम तौर पर उन्हीं लोगों के लिए उपयोग किया जाता है जो किसी एक समान राष्ट्रीयता या एक समान उत्पत्ति के हों और अपने गृह राष्ट्र से बाहर रह रहे हों।


जैसा कि ऊपर कहा गया है, प्रवासी अपने मूल राष्ट्र के हितों को विदेशों में आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। प्रवासियों के लिए अपने मूल देश के विकास में मदद करने का सबसे आसान तरीका है कमाई का एक हिस्सा वहां भेजना।


प्रवासियों की ओर से घर भेजे जाने वाली कमाई के लिहाज से वर्ष 2016 में भारत दुनिया में सबसे ऊपर रहा और यहां 62 अरब डॉलर आए। हालांकि प्रवासियों की अहमियत सिर्फ धन भेजने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे ज्ञान हस्तांतरित करते हैं, संसाधनों को साझा करते हैं, भारत के गैर-आधिकारिक राजदूत का काम करते हैं और विदेशों में भारत के हितों को आगे बढ़ाते हैं।

2015 की अंतरराष्ट्रीय पलायन रिपोर्ट (इंटरनेशनल माइगरेशन रिपोर्ट) का आकलन है कि 1.6 करोड़ हिंदुस्तानी विदेशों में रहते हैं। इस तरह प्रवासियों में भारतियों का समुदाय दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है। क्या इस विशाल समुदाय ने भारतीय हितों का विदेशों में ध्यान रखा है? क्या प्रवासी भारत की विदेश नीति को आकार देने में कोई भूमिका निभाते हैं? संभवतः प्रवासियों ने सबसे बड़ी जो भूमिका 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को साकार करने में निभाई। हालांकि भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को आकार देने और आगे बढ़ाने में प्रवासियों की सक्रियता कितनी है इसको ले कर बहुत स्पष्टता से कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी भारतीय मूल के जितने लोग विदेशों में राजनीति, व्यापार और मनोरंजन में अहम भूमिका में आते हैं उतना ही भारत में उनके निवेश करने और भारत के हितों को आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ जाती है।

इसके दो अच्छे उदाहरण हो सकते हैं पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा और आरयरलैंड के प्रधानमंत्री लियो वरादकर। दोनों ही प्रवासी भारतीय समुदाय से आते हैं। साथ ही ये दो आर्थिक रूप से मजबूत ऐसे देश हैं जो भारत के साथ कारोबार कर सकते हैं। पुर्तगाल भारत के साथ विज्ञान और तकनीक, दोहरे कराधान से बचने, अंतरिक्ष, कारोबार और निवेश के लिए समझौतों पर दस्तखत कर चुका है। इसके अलावा दोनों देशों में चार मिलियन यूरो का कोष विकसित करने पर भी सहमति बन चुकी है जिसके जरिए वे वैज्ञानिक शोध की परियोजनाओं पर साझेदारी कर सकेंगे। जहां तक आयरलैंड और नीदरलैंड जैसे दूसरे देशों की बात है तो उम्मीद की जा रही है कि वे भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) और न्यूक्लियर आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में सदस्यता की कोशिशों में मदद करेंगे। प्रवासी भारतियों के दबाव से इसकी संभावना और अधिक हो जाती है।

भारत को अपने उत्तर अमेरिका के प्रवासियों की मदद से अंतरिक्ष, रक्षा और सुरक्षा संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने में और मदद मिल सकती है। यूनाइटेड स्टेट्स इंडिया पोलिटिकल एक्शन कमेटी (यूएसआईएनपीएसी), फ्रेंड्स ऑफ इंडिया, कनाडा इंडिया फाउंडेशन (सीआईएफ) और कनाडा इंडिया बिजनेस काउंसिल (सीआईबीसी) जैसे समूह पहले से ही भारत के हितों को आगे बढ़ाने में बहुत सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर हाल में, जून, 2017 में अमेरिका में पारित उसके रक्षा बजट को लेते हैं जो कुल 621 अरब अमेरिकी डॉलर का है। इसमें भारतीय-अमेरिकी कांग्रेस सदस्य अमी बेरा ने उस संशोधन पर जोर दिया जिसमें “दोनों देशों के बीच अग्रिम रक्षा सहयोग” को सुनिश्चित किया जा सके। इस संशोधन में अमेरिका के लिए भारत के साथ रक्षा रणनीति तय करने के लिए 180 दिन की समय सीमा भी शामिल थी। कनाडा में सीआईएफ और सीआईबीसी जैसे समूह दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की वकालत कर रहे हैं, जिसमें मुक्त व्यापार समझौता भी शामिल है। इस साल अप्रैल में कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन ने भारत का दौरा किया ताकि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध और मजबूत हो सकें।


सरकार मध्य पूर्व में स्थित प्रवासियों से भी लाभान्वित हो सकती है। निश्चित तौर पर मोदी इस इलाके में भारत के लिए बड़ी भूमिका का सपना देखते हैं, विशेष कर सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्र में।


भारत को सऊदी अरब, इजराएल और कतर के साथ संबंधों को बहुत संतुलित तरीके से चलाना है, क्योंकि इसके हित तीनों ही देशों के साथ जुड़े हुए हैं। इस समय भारत के तीनों ही देशों के साथ बेहतर संबंध चल रहे हैं तो इसकी एक वजह इन देशों में मौजूद प्रवासी भारतीय भी हैं। मध्य पूर्व में स्थित भारतियों के बारे में माना जाता है कि वे बेहद मेहनती और ईमानदार हैं। इस ‘सोफ्ट पॉवर’ की वजह से सऊदी अरब को यह समझाने में मदद मिली है कि भारत इसका दीर्घकालिक व्यापार साझेदार बना रहेगा, जबकि मोदी इजराएल के साथ मजबूत रिश्ते तलाशने में जुटे हैं। इसी तरह, विदेश मंत्री सुष्मा स्वराज ने स्पष्ट कर दिया था कि कतर के कूटनीतिक संकट में भारत सिर्फ अपने प्रवासियों के हितों के लिहाज से ही लिप्त होना चाहता है, अन्यथा इसका मानना है कि यह उस क्षेत्र का अपना मसला है। इस रवैये की वजह से भारत उस क्षेत्र में अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग लेकिन मजबूत संबंध कायम रखने में कामयाब हो पाता है।

प्रवासी भारतीय समुदाय जिन तरह से भारत की मदद करता है उसमें एक छोटा लेकिन अहम तरीका भारत को चोरी गई कलात्मक वस्तुओं को वापस हासिल करने में मदद करना भी है। उदाहरण के तौर पर इंडियन प्राइड प्रोजेक्ट ने आस्ट्रेलिया से मशहूर नटराज और अमेरिका से बलुआ पत्थर की यक्षी को वापस लाने में कामयाबी के साथ मदद की।

हालांकि यह भी नहीं भूलना चाहिए की प्रवासियों की मदद एकतरफा और निरंतर नहीं रह सकती। वे और चीजों के साथ ही भारत की लाल फीताशाही के कटु आलोचक भी रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कनाडाई राजनेता जगमीत सिंह भारत में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले व्यवहार को ले कर बहुत आलोचनात्मक रवैया अपनाते हैं। इसके बावजूद प्रवासी भारतीय हमारे देश के हितों को आगे बढ़ाने में काफी मददगार हो सकते हैं और जब-जब उनकी जरूरत पड़ी है, वे मदद के लिए आगे भी आए हैं। बदले में प्रवासियों की भारत सरकार से विभिन्न तरह की इच्छाएं होती हैं। आस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों के प्रवासियों की मांग होती है कि उन्हें दोहरी नागरिकता मिले और भारत में निवेश के लिए रास्ता आसान हो, जबकि खाड़ी देशों में जाने वाले प्रवासी रोजमर्रा के संकटों से निपटने में सरकार की मदद चाहते हैं। इसी तरह फीजी, कीनिया व त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय अपने देश की ओर ज्यादा गहरे सांस्कृतिक संबंधों की उम्मीद रखते हैं। मोदी सरकार को इन प्रवासी समुदायों के साथ आगे भी मिल कर काम करते रहना होगा ताकि प्रवासियों और उनके गृह राष्ट्रों के बीच के रिश्तों का अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सके। इस लिहाज से हमें अपने अहम कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर देते रहना होगा, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को विस्तार देते रहना होगा और साथ ही व्यापार, रक्षा और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करते रहना होगा।


लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

Source:http://www.orfonline.org/

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