डोकलम में गतिरोध भारत, चीन और भूटान से जुड़ी सीमा विवाद की उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना भू-राजनीतिक गलतियों के एक साथ सामने आ जाने का मसला है।

डोकलम पठार में गतिरोध भारत, चीन और भूटान से जुड़ी सीमा विवाद की उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना एशिया में हुई कई भू-राजनीतिक गलतियों के एक साथ सामने आ जाने का मसला है जो पिछले काफी समय से टकराव की राह पर आ खड़ी हुई थी। चीन की जिद्दी आक्रामकता और भारत का उससे भयभीत न होना, उन विभिन्न वास्तविकताओं से उत्पन्न हुआ है जिसमें वे रह रहे हैं।

चीन का मानना है कि एक प्रक्रिया के द्वारा पूरे एशिया और वास्तव में पूरी दुनिया पर आधिपत्य करना उसकी नियति में है जिसमें दूसरे देश गौण खिलाड़ी हैं। भारत को भी एक महाशक्ति के रूप में उभरने की अपनी नियति और वैश्विक व्यवस्थाओं में बदलाव की किसी भी प्रक्रिया में अपनी एक अपरिहार्य भूमिका को लेकर पूरा भरोसा है।

निश्चित रूप से, चीन की आक्रामकता को इन प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाओं की पृष्ठभूमि में डोकलम पठार पर देखे जाने की आवश्यकता है। जैसे-जैसे एक एशियाई व्यवस्था को स्थापित करने -या कम से कम यह निर्धारित करने कि कौन इसे परिभाषित करता है-की होड़ तेज होती जाएगी, चीन भारत के संकल्प का इम्तहान लेता रहेगा और छोटे पड़ोसी देशों के सामने इसकी छवि एक अविश्वसनीय साझेदार के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहेगा। क्षमताओं में वर्तमान अंतर चीन को उकसाने और संघर्ष के लिए भारत की राजनीतिक इच्छा की सीमाओं को समझने की अनुमति देता है तथा तनाव बढ़ाने एवं तनाव में कमी के एक तरीके का निर्माण करता है जिसका भारत की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। सीमाओं के इसके उल्लंघनों का उद्वेश्य जमीन पर तथ्यों में बदलाव लाना और इससे निपटान के लिए नए नियमों की अनुमति देना है। बहरहाल, चीन के लिए मुर्गों की लड़ाई जैसे इस संघर्ष में शरीक होना नुकसानदायक साबित हो सकता है।

क्षमताओं में वर्तमान अंतर चीन को उकसाने और संघर्ष के लिए भारत की राजनीतिक इच्छा की सीमाओं को समझने की अनुमति देता है तथा युद्ध की तीव्रता एवं तीव्रता में कमी के एक तरीके का सृजन करता है जिसका भारत के सम्मान पर प्रभाव पड़ेगा।

किसी भी सशस्त्र संघर्ष की सूरत में निश्चित रूप से चीन को अधिक नुकसान होगा। इसके ‘शांतिपूर्ण उदय’ पर सवाल उठेंगे एवं विश्व शक्ति बनने की इच्छा रखने वाले इस देश की छवि पड़ोसियों को घुरकी देने वाले की बन जाएगी और यह मध्यम अवधि में छोटे देशों के साथ छोटे-छोटे, क्षेत्रीय झगडों में फंस जाएगा। भारत के लिए, एक बड़ी परमाणु शक्ति के साथ गतिरोध से इसका कोई नुकसान नहीं होगा और यह नाटकीय रूप से चीन के साथ इसके कार्य संबंधों की शर्तों को बदल देगा।

डोकलम गतिरोध के जरिये चीन ने तीन तरह के संदेश दिए हैं। पहला, चीन इस महादेश की अकेली महाशक्ति और इस क्षेत्र में शांति का मध्यस्थ बन कर उभरने के लिए अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करने का इच्छुक है। एक साथ कई विरोधी वृत्तियां जो दुनिया के दूसरे हिस्सों के लिए भले ही अच्छी हों, एशिया के लिए नहीं है। जब भारत ने चीन की परिधि में उसकी ‘वन रोड वन बेल्ट’ पहल को अस्वीकार करने के द्वारा चीन के बादशाह शी जिनपिंग के दरबार में कर्ज, बंधन और राजनीतिक दासता के माध्यम से सिजदा करने से इंकार कर दिया तो उसे दंभ के इस बादशाह का कोपभाजन तो बनना ही था और देरसबेर संघर्ष की स्थिति तो आनी ही थी।

एशिया में अल्पकालिक स्थिरता चीन के बहुत अधिक मायने नहीं रखती क्योंकि उसे अपने विकास के लिए एशियाई बाजारों की आवश्यकता नहीं है।

चीन का दूसरा संदेश यह है कि एशिया में अल्पकालिक स्थिरता चीन के बहुत अधिक मायने नहीं रखती क्योंकि उसे अपने आर्थिक विकास के लिए एशियाई बाजारों की आवश्यकता नहीं है। यूरेशिया के भूमिमार्गों के साथ साथ सड़क एवं रेल अवसंरचना तथा हिन्द महासागर और भूमध्य महासागर में समुद्री रास्तों के जरिये चीन को 18 ट्रिलियन डॉलर के यूरोपीय बाजार तक पहुंच हासिल कर लेने की उम्मीद है। इस वास्तविकता को देखते हुए, कोई भी एशियाई देश चीन को उसके बर्ताव में बदलाव लाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता क्योंकि यूरोप में उसे बहुत बड़े आर्थिक लाभ की संभावना दिख रही है।

और अंत में, चीन ने संकेत दिया है कि पैक्स सिनिका केवल एक आर्थिक विन्यास भर नहीं है बल्कि एक सैन्य और राजनीतिक उपक्रम भी है। दक्षिण चीनी समुद्र में उसके आक्रामक तेवर, जम्मू एवं कश्मीर में भारत की संप्रभुता के प्रति निरादर, आसियान क्षेत्र में फूट डालो और राज करो की उसकी नीति तथा ग्वादर और जिबौती जैसे विदेशी बंदरगाहों में सामरिक निवेश, ये सभी एक चीन-केंद्रित आर्थिक एवं सुरक्षा ढांचे की स्थापना करने के उसके इरादों के संकेत हैं जिनके लिए आवश्यकता पड़ने पर वह बल का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकेगा। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव और यूरोप में राजनीतिक विभाजन ने चीन के इस विश्वास को और मजबूत बनाया है कि अपनी ताकत के बल पर विश्व पर वह अब अपना आधिपत्य कायम कर सकता है।

देश की पूर्वी सीमा पर दिए गए कड़े संदेशों पर अब भारत क्या कर सकता है?

भारत के लिए विकल्प सीमित हैं। पहला विकल्प एशिया के ऊपर चीन के आधिपत्य को चुपचाप स्वीकार लेना है। अतीत में, भारत की विदेश नीति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के पक्ष को समर्थन देने के लिए नेहरू के जोर से लेकर विश्व व्यापार संगठन में उसके प्रवेश को सुगम बनाने तक एक बड़ी एशियाई परियोजना में चीन के साथ सहयोग करने की रही है। पर आज यह स्पष्ट हो गया है कि यह दृष्टिकोण गलत था और चीन के पीछे पीछे चलते रहने से न केवल उसे राजनीतिक रियायत देनी पड़ेगी बल्कि पाकिस्तान जैसे चीन समर्थित विरोधियों को क्षेत्रीय रियायत भी देनी पड़ेगी।

भारत के लिए एक दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि वह अपने देश की परिधि में चीन की आक्रामक रणनीतियों से संबंधित एक स्पष्ट या लाल रेखा खींच देने के जरिये उसका माकूल जवाब दे और ‘भूमि अधिग्रहण’ की उनकी कोशिशों को मुश्किल बना दे।

भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया इस संबंध में ज्ञानवर्धक साबित हो सकता है। भारत की उत्कृष्ट पारंपरिक क्षमताओं तथा युद्धकला तकनीकों की एक व्यापक श्रृंखला की बराबरी करने के लिए सामरिक परमाणु हथियारों के उसके विकास ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत क्षेत्रीय मामलों में विषम स्थिति में है। लंबे समय से, भारतीय टिप्पणीकारों एवं राजनयिक समूहों का मानना रहा है कि चीन के साथ सीमा विवाद को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि द्विपक्षीय संबंध मामूली क्षेत्रीय झड़पों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसा करने के द्वारा उन्होंने चीन के इस दबंग व्यवहार को सामान्य करार दिया है जिसने अब इसे अपने लाभ के लिए बेजा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है एवं अनसुलझी सीमाओं को भारत के लिए तनाव के स्थायी स्रोत के रूप में तबदील कर दिया है। इसलिए, अब समय आ गया है कि सीमा विवाद को मुख्य रणनीतिक चिंता के रूप में उभारा जाए एवं देश की पूर्वी सीमा पर चीन के खतरों का प्रतिरोध करने के लिए विकल्पों को सुस्पष्ट तरीके से सामने रखा जाए। भारत अभी तक उसी विकल्प का अनुसरण करता रहा है जिसमें उसकी संप्रभुता एवं क्षेत्रीय चिंताओं की कोई फिक्र नहीं की गई थी। पर अब समय आ गया है कि पुरजोर साहस का परिचय दिया जाए और इन समस्याओं से निपटने के लिए एक स्पष्ट खाका तैयार कर दिया जाए।

चीन निरर्थक ही भारत को एक ऐसे संघर्ष की तरफ धकेलने का प्रयास कर रहा है जिसके बारे में उसका मानना है कि इससे उसे जल्द एशिया में अधिक मजबूत होने का दर्जा हासिल हो जाएगा। विडंबना यह है कि चीन यह स्वीकार कर पाने में विफल रहा है कि भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने की तरह का बर्ताव नहीं करना है क्योंकि वह ऐसा वास्तव में नहीं है। डोकलम पठार की झड़पों का भारत द्वारा त्वरित और आक्रामक तरीके से जवाब दिया जा सकता है जिससे उसके सम्मान का लगभग कोई भी नुकसान नहीं होगा। आखिरकार, उस स्थिति में वह अपनी संप्रभुता की रक्षा ही तो कर रहा होगा और इस प्रक्रिया में वह चीन के छोटे पड़ोसी देशों को ऐसा ही रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित भी कर रहा होगा। अगर चीन अपनी एक विवादित क्षेत्रीय शक्ति की छवि बनाने का इच्छुक है तो उसे भारत को केवल झड़पों की एक नई श्रृंखला की तरफ उकसाने और एशिया में चीन के कई सारे भूमि सीमाओं और सामुद्रिक विवादों को लेकर -राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से चिढ़ा देने की जरुरत है।


यह टिप्पणी मूल रूप से NDTV पर प्रकाशित हुई थी।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

Source:http://www.orfonline.org/

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here