तीखे मतभेदों के बावजूद ‘श्रीनगर वार्ता’ आश्‍चर्यजनक रूप से ‘श्रीनगर आम सहमति’ के रूप में तब्दील हो गई है और इसके साथ ही यह निर्विवाद रूप से स्वतंत्र भारत की सबसे दूरगामी नीति निर्माण प्रक्रिया बन गई है।

केंद्र और राज्य सरकारों की अब तक की पहली संयुक्त राजकोषीय नीति शुक्रवार (19 मई) को ‘श्रीनगर में आम सहमति’ के रूप में व्‍यक्‍त की गई। इतना ही नहीं, यह आर्थिक विकास के मोर्चे पर भारत द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। इसने उन दो स्तंभों को मजबूती प्रदान की है जिन पर किसी भी सरकार की आर्थिक स्थिरता टिकी रहती है। पहला स्तंभ महंगाई पर नियंत्रण है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने श्रीनगर में वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की बैठक के बाद कहा, ‘शायद ही किसी पर टैक्‍स दरें बढ़ाई गई हैं।’ उन्‍होंने कहा, ‘या तो मौजूदा टैक्‍स दरों को ही बनाए रखा गया है अथवा उन्हें कम किया गया है।’ इसका सीधा सा मतलब यही है कि कुल मिलाकर जीएसटी के चलते अर्थव्यवस्था में कीमतें नहीं बढ़ेंगी, जो निश्चित तौर पर ‘अच्छी राजनीति’ है क्‍योंकि लोगों एवं परिवारों के चेहरे पर खुशियां झलकेंगी। इतना ही नहीं, यह ‘अच्छा अर्थशास्त्र’ भी है क्‍योंकि इससे राजकोष की सेहत पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

दूसरा स्तंभ महंगाई के ठीक बगल में अवस्थित है और वह इस बात का परिचायक है कि श्री जेटली के साथ-साथ 32 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्री भी यह मानकर चल रहे हैं कि जीएसटी को लागू करने से होने वाला विकास आने वाले समय में पूरी तरह से इस नई एवं अत्‍यधिक अनुपालन वाली टैक्‍स प्रणाली को अपनाने में होने वाली हानि की भरपाई कर देगा। वे इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं: हम कम जीएसटी दरों के जरिए महंगाई को नियंत्रण में करके कैसे मतदाता-उपभोक्ताओं को संतुष्ट रख सकते हैं और इसके बावजूद शुद्ध टैक्‍स प्रवाह में वृद्धि भी कर सकते हैं? इसका उत्तर सरल है: वस्‍तुओं के उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं द्वारा किए जाने वाले मूल्य वर्धन पर दांव लगाया जाए और उसमें वृद्धि की उम्‍मीद की जाए क्‍योंकि इस पर जीएसटी लगेगा और फि‍र कम या स्थिर टैक्‍स दरों के कारण कर राजस्व में होने वाली किसी भी कमी की भरपाई इसके जरिए की जा सकेगी। बिजनेस की भाषा में इसका मतलब यही है कि मार्जिन के बजाय उत्‍पादन या कारोबार का स्‍तर बढ़ाने पर ध्‍यान केंद्रित किया जाए। मतलब, परिषद का यह मानना है कि जीएसटी के जरिए सामर्थ्‍य में होने वाली वृद्धि की बदौलत भारतीय उद्यमी और उनके माध्‍यम से भारतीय अर्थव्यवस्था आगे चलकर फलने-फूलने वाली है। यहां पर कोई भी नकारात्मक पक्ष केंद्र और राज्य सरकारों दोनों के ही राजकोषीय घाटे को तकलीफदेह बना देगा।

तीखे मतभेदों के बावजूद श्रीनगर वार्ता आश्‍चर्यजनक रूप से ‘श्रीनगर आम सहमति’ के रूप में तब्दील हो गई है और इसके साथ ही यह निर्विवाद रूप से स्वतंत्र भारत की सबसे दूरगामी नीति निर्माण प्रक्रिया बन गई है और यह संघीय राजनीति के नक्शे पर एक स्थायी एवं सकारात्मक बदलाव को दर्शाती है तथा जिस तरह से आर्थिक सुधारों की परिकल्‍पना की जाती है उस राह में यह मील का पत्थर है। यह ‘आम स‍हमति’ का रूप इसलिए ले पाई क्‍योंकि सरकारें आपस में मिलकर एक ऐसी आर्थिक नीति बनाने के लिए एकजुट हो गईं जो अपने सार में परिवर्तनकारी है, जिसका दायरा अत्‍यंत व्‍यापक है और जो न केवल राज्यों के बीच, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच भी सहभागितापूर्ण लोकतंत्र के दृढ़ विश्‍वास को दर्शाती है।

इसके ठीक विपरीत, वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों को स्मरण करें, जिनके तहत रुपये के अवमूल्यन से लेकर लाइसेंस राज की समाप्ति तक और वित्तीय नियामक ढांचों के निर्माण से लेकर विदेशी पूंजी की राह की बाधाओं को दूर करने तक यानी समस्‍त फैसलों की अगुवाई केंद्र ने ही की थी और वही हर मामले में हावी भी था। इसी तरह यह स्‍मरण करें कि नीति आयोग के अस्तित्‍व में आने तक किस तरह से राज्य सरकारों को आवश्‍यक धनराशि (फंड) पाने के लिए योजना आयोग की चिरौरी करनी पड़ती थी। जीएसटी परिषद ने सब कुछ बदल कर रख दिया है क्‍योंकि इसमें केंद्रीय वित्त मंत्री, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री और प्रत्येक राज्य के वित्त मंत्री (या कोई अन्य नामित मंत्री) शामिल हैं। आज परिषद आपसी सहमति से करों एवं रियायतों, कानूनों एवं सिद्धांतों, दरों और प्रावधानों के बारे में निर्णय लेती है।

जम्मू-कश्मीर के वित्त मंत्री हसीब द्राबू ने कहा, ‘जीएसटी परिषद राजकोषीय और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से भारत की पहली संघीय संस्था है।’ उन्‍होंने कहा, ‘जीएसटी भारत के संघीय ढांचे के राजकोषीय और राजनीतिक पक्ष में व्‍यापक बदलाव लाएगा, क्योंकि उसकी बदौलत जबरन संघवाद का स्‍थान सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद ले लेगा।’ असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि परिषद की बैठक के दौरान दो दिनों में 14 तरह के विचार-विमर्श से राज्यों के वित्त मंत्रियों के बीच विश्वास पनपा है। इस संस्था का स्‍वरूप ऐसा है कि इसने राज्यों एवं केंद्र के मंत्रियों को एक-दूसरे के साथ सहानुभूति दर्शाने और कुछ इस तरह से आपस में सहयोग करने के लिए विवश किया है कि इष्टतम परिणाम निकले यानी भारत एकल बाजार में तब्‍दील हो जाए।

वैसे, जीएसटी की राजनीति को तो पहले से ही सफल बताया जा रहा था। विभिन्न विचारधाराओं, परिवारों, असहज और विजन वाले राजनीतिक दलों को एकल विधायी मेज पर लाना अपने-आप में कोई उपलब्धि नहीं है क्‍योंकि कानून बनने से पहले इस विधेयक को आगे बढ़ाने की जिम्‍मेदारी कई सरकारों ने संभाली थी। दरअसल, इससे ज्‍यादातर महत्‍वपूर्ण तो आर्थिक मसले थे जिन्‍हें विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की विविध जरूरतों और ताकतों को ध्‍यान में रखते हुए सुलझाना अत्‍यंत आवश्‍यक था। एक और बात। यदि श्री जेटली का यह अनुमान सही साबित होता है कि टैक्‍स दरें समान या कम रहने पर भी महंगाई दर के साथ-साथ राजकोष की सेहत पहले की ही तरह दुरुस्‍त रहेंगी, तो यह कहना गलत न होगा कि भारत की संघीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में इतना ज्‍यादा सफल सामंजस्य इससे पहले कभी नहीं देखा गया है। हालांकि, श्री जेटली के इस अनुमान या दावे की पुष्टि जीएसटी लागू होने के बाद पहली दो तिमाहियां गुजर जाने पर ही होगी।

हालांकि, तकनीकी रूप से, अभी अंतिम दर घोषित नहीं की गई है। यह आवश्‍यक है क्‍योंकि इसी के आधार पर तो परिषद के निर्णयों का आकलन किया जा सकता है। अभी तो केवल विभिन्‍न वस्‍तुओं के लिए अधूरी दर अनुसूची और विभिन्न आपूर्तियों के लिए मुआवजा उपकर दरें जारी की गई हैं। दरअसल, यह दर अब भी भ्रामक है जिसे सभी दरों के साथ-साथ उनसे जुड़े राजस्व को ध्‍यान में रखते हुए तय किया गया है। इसे ‘राजस्व तटस्थ दर’ (आरएनआर) या एकल दर के रूप में परिभाषित किया गया है जो केंद्र और राज्यों के राजस्व को वांछित स्तरों पर बरकरार रखती है। वर्ष 2015 में अरविंद सुब्रमण्यन समिति ने दर को 15.0 फीसदी से लेकर 15.5 फीसदी तक के दायरे में रखा था, जबकि इससे पांच साल पहले यानी वर्ष 2009 में वस्‍तु एवं सेवा कर पर अरबिंद मोदी कार्य दल ने इसे 11 फीसदी तय करने को कहा था, जो ज्‍यादा अनुपालन और जीडीपी वृद्धि से होने वाले राजस्व लाभ को छोड़कर हो।

हम यह मान कर चलते हैं कि जीएसटी परिषद ने मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन की 15.0-15.5 फीसदी दर की अनुशंसा को ही स्‍वीकार किया है, जिससे उनके कुछ सहयोगी असहमत हैं, और टैक्‍स दरें या तो समान या कम ही रहती हैं तो यह कहना गलत न होगा कि परिषद इसके जरिए उद्यमियों में एक नया विश्वास जगाने की कोशिश कर रही है। इसने या तो अपने अति-आशावादी राजनीतिक रुख के मद्देनजर अनुपालन की अपेक्षित समस्याओं की अनदेखी कर दी है, या अपनी सियासी सफलता में बेखबर हो गई है, या बस इस बात से अनजान है कि उसकी नाक के ठीक नीचे नियम पुस्तिका के साथ क्या हो रहा है। यह माना जा रहा है कि बगैर किसी बाधा के ही जीएसटी का मार्ग प्रशस्‍त हो जाएगा, 1 जुलाई से जीएसटी के लागू होते ही कारोबारीगण भी इस नई कर प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो जाएंगे, जीएसटी सुविधा प्रदाता समस्‍त आवश्यक जानकारियां बेहद आसानी से प्रदान करने लगेंगे और उद्यमी समय पर ही जीएसटी के अनुसार खुद को ढाल लेंगे।

शायद वे सही हैं और उन्हें सही होना भी चाहिए, अन्यथा राजकोषीय पुस्तकों अथवा आंकड़ों में संतुलन नहीं हो पाएगा। यही नहीं, पर्याप्त चेतावनियां भी दी गई हैं। पिछले सप्ताह राज्यों की माली हालत पर रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में इस तथ्‍य का उल्लेख किया गया, ‘वर्ष 2015-16 में सकल राजकोषीय घाटे (जीएफडी) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अनुपात वर्ष 2004-05 के बाद पहली बार राजकोषीय विवेक के 3 फीसदी की सीमा के पार गया।’ रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है, ’25 राज्यों के बारे में उपलब्‍ध जानकारियों से पता चला है कि 2016-17 के लिए राज्यों द्वारा अनुमानित राजकोषीय सेहत बेहतरी मुमकिन नहीं हो पाएगी।’ इस मामले में ढिलाई बरतने वाले प्रमुख राज्‍यों में जम्मू-कश्मीर भी शामिल है जिसका जीएफडी वर्ष 2016-17 में सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 8.8 फीसदी था। इसी तरह यह गोवा में 6.8 फीसदी, राजस्‍थान में 5.6 फीसदी, हरियाणा में 4.6 फीसदी और उत्‍तर प्रदेश में 3.9 फीसदी था। ये सभी पांच राज्य ऐसे हैं जहां या तो भाजपा की ही सरकार है या वह सरकार में भागीदार है। वहीं, 36,000 करोड़ रुपये की कृषि ऋण माफी के कारण उत्तर प्रदेश के घाटे का दोगुना होना तय है।

अब ऐसा कोई भी उपाय नहीं बचा है कि ‘श्रीनगर आम सहमति’ के अंतर्गत खासकर जीएसटी को लागू करने के प्रथम वर्ष में इस तरह का राजकोषीय जोखिम मोल लेना संभव हो पाएगा। अंतिम आंकड़े आने में अभी कुछ कसर रह गई है। उदाहरण के लिए, सोने पर टैक्‍स दरें अभी तय नहीं की गई हैं। ऐसे में निर्णायक विश्लेषण करना मुमकिन नहीं है। परिषद संभवत: देश भर में एक समान टैक्‍स दर संरचना के परिणामस्‍वरूप व्‍यवसाय में होने वाली सहूलियत से संभावित आर्थिक लाभ पर दांव लगा रही है। यह शायद ‘टैक्‍स पर टैक्‍स लगाए जाने’ की संभावना की समाप्ति पर भी दांव लगा रही है जो एक वित्तीय और प्रशासनिक खतरा रहा है। यह एक दांव का रूप ले सकता है कि लेन-देन की लागत में कमी से भारत का निर्यात और ज्‍यादा प्रतिस्पर्धी बन जाएगा। ये सभी जीएसटी में सन्निहित हैं। हालांकि, जीएसटी को अपनाने में लगने वाले समय और उद्यमियों के लिए अनुपालन लागत के बारे में संभवत: वास्‍तविकता से कुछ ज्‍यादा ही आकलन कर लिया गया है जो कागज और नियम पुस्तिकाओं में तो सही प्रतीत हो रहा है, लेकिन इसे लागू करते समय करारा झटका लग सकता है।

राजकोषीय दांव भारत के लिए नई बात नहीं है। वर्ष 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आमूलचूल सुधार का दांव खेला था जो सही निशाने पर लगा था। आयकर की अधिकतम दर वित्त मंत्री वाई.बी. चव्हाण के जमाने में सत्‍तर के दशक के आरंभ में 93.5 फीसदी थी जो 1985-1996 में वित्त मंत्री वी.पी. सिंह के कार्यकाल में घटकर 50 फीसदी और वर्ष 1997-98 में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में और भी घटकर 30 फीसदी रह गई। कहने का मतलब यह है कि टैक्स की दरों में लगातार कमी की जाती रही है। यह भी सही कदम साबित हुआ है। घोषणा के समय ये सभी सुधार अप्रत्याशित, कठिन और यहां तक कि असंभव भी प्रतीत हो रहे थे। हालांकि, आखिरकार इन सभी सुधारों के परिणामस्‍वरूप कर आधार बढ़ गया, बाजारों का विस्‍तारीकरण हुआ और इसके साथ ही संपत्ति का सृजन भी हुआ। ‘श्रीनगर में जीएसटी पर आम सहमति’ को भी भविष्‍य में इसी तरह की शानदार कामयाबी मिलने की उम्‍मीद बंध रही है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here